गणेश जी की कहानी

 

गणेश जी की कहानी

 

व्रत में गणेश जी की कहानी क्यो सुन्नी चाहिए?

गणेश जी की कहानी सभी प्रकार के व्रत में सुनी जाती है। कोई भी व्रत करने पर उस वक़्त की कहानी के अलावा गणेश जी की कहानी भी सुनी जाती है। इसमें व्रत का पूरा फल मिलता है। गणेशः जी को विघ्न हारता के नाम से भी जाना जाता है और हिन्दू धर्म में हर काम की शुरुआत गणेश जी का नाम लेकर की जाती हैं। इसलिए हमें व्रत की कहानी के साथ गणेश जी की कहानिया भी सुन्नी चाहिए।

 

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एक बुढ़िया थी वह बहुत ही गरीब और अंधी थी।  उसका एक बेटा और बहु थी। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट हो कर उस बुढ़िया से बोलें –

‘बुढ़िया माँ! तू जो चाहे सो मांग ले।’

बुढ़िया बोली – ‘मुझे यो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू ?’

तब गणेश जी बोले – ‘अपने बहु – बेटे से पूछकर मांग लीजिए।’

तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा – गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता में क्या मांगू?’

पुत्र ने कहा – ‘माँ! तू धन मांग ले।’

बहु ने कहा – ‘नाती मांग ले।’

तब बुढ़िया ने सोच की ये तो अपनी – अपनी मतलब की बात कह रहे हैं।

अतः उस बुढ़िया ने पड़ोसियों से पूछा, तो उन्होंने कहा – ‘बुढ़िया! तू तो अपनी आँखों की रौशनी मांग ले, जिसमे तेरी जिंदगी आराम से कट जाए।’

इस पर बुढ़िया बोली – ‘यदि आप प्रसन्न हैं तो, मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, नाती – पोता दें, अमर सुहाग दें, आँखों की रौशनी दें, सब परिवार को सुख दें और अंतः में मोक्ष दें।

यह सुनकर गणेशजी बोले – ‘बुढ़िया माँ! तूने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने माँगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धारण हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो भी कुछ माँगा वह सब कुछ उसे मिल गया।

हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सब कुछ दिया, वैसे ही सब को देना।

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