गणेश (विनायक) जी महाराज की व्रत कथा 2020

 

गणेश (विनायक) जी महाराज  की व्रत कथा/ कहानी 

एक गांव में एक सेठ अपने परिवार के साथ रहता था। सेठ का गांव और आस-पास के शहरों में बहुत  बड़ा व्यापर करता  था। सेठ जी का गणेश जी भगवान पर बहुत विश्वास करता था क्योंकि सेठ का  मानना था की उससे परिवार की सुख शांति और ख़ुशीहाली  गणेश  जी की कृपा से  है.सेठ जी रोजना  नदी में नहाने जाते थे।  और  वापस आकर रोज गणेश भगवान की पूजा करता था और पूजा करके रोजाना गणेश जी को  भोग (प्रसाद ) लगाता और फिर स्वयं भोजन करता  था । यह बात सेठानी जी को अच्छी नहीं लगती थी।  वो धार्मिक नहीं थी और भगवान की पूजा पाठ में विश्वाश नहीं रखती थी। एक बार सेठानी जी ने सोचा की यह गणेश जी को इतना मानते है, गणेश जी की इतनी पूजा करते है इससे होता क्या है।  आज तो में देखती हूँ केसे वो गणेश जी की इतनी पूजा करते है। अगले दिन जब सेठ जी नदी पर नहाने जाते है तो सेठानी जी गणेश जी की मूर्ति को उठाकर उसे मूर्ति को कपडे से ढक कर बगीचे में जमींन के अंदर दबा देती है। जब सेठ जी नदी से नहाकर वापस आते है और देखते है की गणेश जी की मूर्ति तो मंदिर में नहीं है तो वो सेठानी जी से पूछते है गणेश जी की मूर्ति मंदिर में नहीं है तो कहा गयी, सेठानी बोलती है मुझे नहीं मालूम। मूर्ति को घर में बहुत  ढूंढा जाता है उस दिन क्योंकि वो गणेश जी को भोग नहीं लगा पाए इसके लिए खाना भी नहीं खाते है और गणेश जी से प्रार्थना करते है की प्रभु लगता है आप मुहसे नाराज़ हो गए हो और कही चले गए हो।

अब जब तक आप वापस नहीं आओगे में खाना नहीं खाऊंगा, यह दिन पूरा निकल जाता है। सेठ की भक्ति में अनन्य श्रद्धा थी इसलिए उसी रात एक चमत्कार हुआ सेठ जी को सपना आया जिसमे वे एक छोटे से चूहे के साथ खेल रहे होते है और चूहे को खाने को एक लड्डू देते है। चूहा लड्डू लेके बगीचे में जाता है और जमींन को खोदता है और लड्डू को वही छोड़ देता है।  अचानक सेठ जी की नींद खुल जाती है और सेठजी बगीचे में जाते है और वही खोदते है जहा उन्होंने सपने में देखा था।  और वही उन्हें कपडे में लिपटे हुए गणेश जी की मूर्ति दिखती है। सेठ जी गणेश जी की मूरतोई की पूजा करके उनको वापिस स्थान पर रखते है। और सेठानी को सब बात बताते है। बात जानकर सेठानी जी को आश्चर्य होता है और अपनी “सच्ची श्रद्धा हो तो ईश्वर जमीं फाड़कर भी निकलते है, सच्ची श्रद्धा और विश्वास भी ईश्वर का ही एक रूप है”

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