निर्जला एकादशी की पूजा अर्चना  विधि और व्रत कथा

  निर्जला एकादशी की पूजा अर्चना  विधि और व्रत कथा

एकादशी की पूजा अर्चना  विधि और व्रत कथा ,ऐसे करे भगवान विष्णु को प्रसन्न    ;ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है और एक साल में 24 एकादशियो में से इस एकादशी को सबसे बड़ी एकादशी मानी जाती है हिन्दू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है  साल में 24 एकादशी होती है और अधिक मास या मलमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है इन्हीं में से एक ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है इस एकादशी को

पानी पीना वर्जित है इसलिये तो इसको निर्जला एकादशी कहते है ऐसा माना जाता है की  निर्जला एकादशी का व्रत  जो व्यक्ति  विधि -विधान से करता है उसे साल की सभी एकादशियो का फल प्राप्त हो जाता है इसे भीम सेन एकादशी भी कहा जाता है क्योकि महर्षि वेद व्यास के अनुसार भीमसेन ने इसे धारण किया था निर्जला एकादशी या भीमसेन एकादशी के दिन निर्जल रहकर भगवान विष्णु की आराधना की जाती है इस व्रत के करने से व्यक्ति की लम्बी आयु और उसके जीवन की सभी समस्याये दूर होती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है निर्जला एकदशी के दिन दान -पुण्य करने का भी विशेष महत्व होता है

एकादशी तिथि -गुरुवार ,2 जून 2020

 

पूजन विधि –

एकादशी तिथि के सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है इसके बाद दान -करके इस व्रत का विधान पूर्ण होता है इस दिन शात्रीय विधि अनुसार भगवान विष्णु की पूजा -अर्चना करनी चाहिये ॐ भगवते वासुदेवाय;नम मंत्र  जाप करे और इस दिन दान -पुण्य विशेष महत्व होता है किसी पंडित या मंदिर में जल से भरा कलश  व उस परसफेद वस्त्र को रखे और उस पर चीनी और दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दे

और गर्मी में काम आने वाली वस्तुओ का दान करे जैसे छाता ,पंखी  ,वस्र ,  और फल तरबूज ,खरबूजा ,आम ,रोबजा, दूध आदि का दान करना चाहिये और निर्जला एकादशी को जल से भरा कलश और गौ (गाय )दान विशेष महत्व है

व्रत कथा -एक दिन महृषि व्यास ने पांडवो को एकाद्शी के व्रत का विधान तथा फल बताया इस दिन जब वे भोजन करने के दोषो की चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुये कहाँ ”पितामह ”एकादशी का व्रत करते हुये सभी पांडव परिवार इस दिन अन्न जल न ग्रहण करे ,आपके इस आदेश का पालन मुझसे नहीं  हो पायेगा क्योकि मै तो  बिना खाये नहीं रह सकता इसलिये 24 एकादशियों पर निराहार रहने की कष्ट साधना से बचने के लिए मुझे कोई एक ऐसा व्रत बताइये जिसे करने से मुझे विशेष असुविधा ना हो औ र फल भी मिल जाये जो अन्य लोगो को 24 एकादशी व्रत करने पर मिलता है

महृषि व्यास जानते थे की भीमसेन के उदर में वृक नामक अग्नि है इसलिये तो भीमसेन ज्यादा खाना खाने के बाद भी उनकी भूख शांत नहीं होती इसलिये भीमसेन के अनुरोध पर  महृषि व्यास ने कहाँ  ”प्रियभीम ‘तुम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की  एकादशी के दिन निर्जल व्रत करो इस दिन अन्न और जल दोनों का

त्याग करना पड़ता है जो भी  मनुष्य एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीये रहता है और सच्ची श्रदा से निर्जला व्रत का पालन करता है उसे साल में 23 और  एकादशी आती है उन सब एकादशी का फल ,इस एक  निर्जला एकादशी का व्रत करने से मिल जाता है

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