सकत चौथ व्रत कथा

सकत चौथ व्रत कथा

  1. धार्मिक मान्यतानुसार एक राज्य का राजा महाराजा हरिश्चंद था। महाराजा के राज्य में एक कुम्हार रहा करता था। एक बार उस कुम्हार ने बर्तन बनाने के लिए आवा लगाया, पर आवा पका ही नहीं। बार – बार, कई बार ऐसा ही हुआ। अब बर्तन वाले का बहुत नुकसान हो गया। संकष्टी चतुर्थी के दिन कुम्हार एक तांत्रिक के पास मदद मांगने के लिए गया। तांत्रिक ने कुम्हार को एक भयानक उपाय बताया, तांत्रिक ने कुम्हार को एक बच्चे की बलि देने को बोला। उस दिन एक बालक की मां ने अपनी संतान की सुख शांति, समृद्धि
    और लंबी आयु के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा हुआ था। कुम्हार ने उस महिला के बालक को आवा में डाल दिया। यह देख बालक की माता ने अपने बच्चे की सलामती के लिए भगवान गणेश से प्राथना की। अब जब कुम्हार बर्तन को देखने गया तो सभी बर्तन पके हुए थे और बालक भी सही – सलामत वही पर बैठा था। यह सब देख कुम्हार भयभीत हो गया और राजा हरिश्चंद को पूरी बात सुनाई। यह सब सुन कर रा ने तुरंत उस बालक और उसकी माता को बुलाया। मां आते ही संकट चौथ की महिमा का गुणगान करने लगी। इसके बाद से हर महिला अपनी संतान के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने लगी।

 

 

  1. एक बार की बात है, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह की तैयारी चली रही थी। विवाह में सभी देवताओं को आमंत्रित दिया गया था परन्तु भगवान गणेश को विवाह के आमंत्रण नहीं भेजा गया था। सभी देवता अपनी पत्नी के साथ विवाह में शामिल हुएं। सभी ने जब भगवान गणेश को वहां न पाया तो उन्होंने भगवान विष्णु से इसका कारण पुछा। भगवान विष्णु ने इसका जवाब दिया की मैंने भगवान शिव और माता पारवती को आमंत्रित और गणेश अपने माता – पिता के साथ भी आ सकते थे। और यह भी कहा की भगवान गणेश को सवा मन चावल, घी, लड्डू और मूंग का भोजन लगता है। भला कोई किसी और के घर जाकर इतना खाता है। अच्छा हुआ वो नहीं आएं। तभी एक देवता ने कहा, की गणेश जी अगर आएं तो उनको घर के देख भाल की जिम्मेदारी के लिए रखा जा सकता है। गणेश जी से कहा जा सकता है की आप मूषक पर बैठ कर धीरे – धीरे आएंगे तो बारात आगे चली जाएगी और वो पीछे ही रह जाएंगे, ऐसे होने पर अब आप घर की देख – रेख कर कर लें। अब विष्णु जी ने गणेश जी को आमंत्रण किया और आमंत्रण पर गणश जी वहां आए। गणेश जी को विष्णु जी के घर के देख – रेख की जिम्मेदारी दे दी गई। अब गणेश जी घर पर अकेले थे और तभी नारद जी वहां पर आए और इसका कारण पूछा। गणेश जी ने नारद को कहा की भगवान विष्णु ने उन अपमान किया है। यह सब सुन गणेश जी को नारद जी ने एक हल बताया। गणेश जी ने हल के तहत अपने मूषक के दल को बारात के आगे भेज दिया और रास्ता खुदवा दिया। रास्ता खुदा होने की वजह से सभी रथ रस्ते में धंस गए और वो सब बीच रस्ते में रुक गए। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, फिर नारद जी ने विघ्नहर्ता गणेश जी को बुलाने की बात रखी। भगवान शिव के आदेश गणेश जी को बुलाया गया। अब देवताओं ने गणेश जी की पूजा की। फिर सभी पहिये गड्ढे से निकल गए परंतु कई पहिये टूट गए थे। तभी वही पास में एक लोहार काम कर रहा था, उसे वह पर बुलाया गया। लोहार ने अपना कार्य शुरू कर दिया और काम शुरू करने से पहले अपने मन में गणेश जी का संस्मरण किया और बहुत जल्दी सारे पहिये ठीक कर दिए। लुहार ने कहा की आपने शुभ कार्य करने से पहले पहले गणेश जी की पूजा नहीं की थी। आप सब को गणेश जी का स्मरण काम शुरू करना चाहिए। कार्य हमेशा सफल होगा। सभी बाराती अब अपने स्थान पर सुरक्षित पहुँच गएं और भगवान िष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह संपन्न हो गया।

 

  1. एक बार की बात है। एक दिन माता पार्वती नदी के किनारे बैठी हुई थी और उनके साथ भगवान शिव थे। माता पार्वती को चोपड़ खेलने की इच्छा हुई। पर वह केवल दो ही लोग थे और कोई तीसरा नहीं था, जो खेलमें हर जीत का फैसला करे। ऐसे देख शिव जी ने एक मिटटी के पुतले में जान फूंक दी। अब वह तीन लोग हो गए। चोपड़ के खेल में माता पर्वती 4 बार जीत गई। परन्तु एक बार निर्णायक ने माता पारवती हो हरा हुआ और शिव जी को जीता हुआ घोषित कर दिया। यह देख माता पार्वती क्रोधित हो उठी। क्रोधित माता पार्वती ने उस निर्णायक को श्राप दे कर लंगड़ा बना दिया। उस निर्णायक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी पर माता पारवती ने कहा के ये श्राप अब वापस नहीं होगा। परन्तु एक उपाय दिया। माता पार्वती ने कहा, संकष्टी चतुर्थी के दिन कुछ माताएं और कन्याएं यहाँ पूजा हेतु आती है। तुम उनसे व्रत और पूजा की विधि पूछ कर व्रत रखों। उसने ठीक वैसा ही किया और संकष्टी पूजा का व्रत संपन्न किया। उसकी व्रत और पूजा का परिणाम गणेश जी ने उसका पैर ठीक कर दिया।

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