अपरा एकादशी कब है ,जाने शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

 अपरा एकादशी कब है ,जाने शुभ मुहूर्त ,महत्व &व्रत कथा और पारण का सही  समय / कथा सुनने से श्री लक्ष्मीनारायण का मिलेगा भरपूर आशिर्वाद !

अपरा एकादशी कब है ,जाने शुभ मुहूर्त ,और व्रत कथाकी कथा सुनने से श्री लक्ष्मी नारायण का मिलेगा भरपूर आशीर्वाद। अपरा एकादशी की कथा सुनने से कई रहस्यमई और चमत्कारी फायदे होते हैं।  सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास की ग्यारस यानी 11वीं तिथि एकादशी कहलाती है जिसका धार्मिक रूप से बहुत महत्व होता है सनातन हिंदू पंचांग में एकादशी के दिन व्रत उपवास पूजा करना बहुत ही लाभदाई माना गया है।

अपरा एकादशी कब है ,जाने शुभ मुहूर्त ,और व्रत कथा प्रत्येक मास के दोनों पक्ष में एकादशी आती है और दोनों एकादशी यों का अपना-अपना महत्व होता है। जेष्ठ मास के कृष्ण पक्ष और जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी बहुत ही खास मनु जाती है हाला की समस्त एकादशी यू जेष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी जो कि अगले महीने आएगी जो सर्वोत्तम माना जाती है।

लेकिन जेष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी जिसे अपरा एकादशी कहा जाता है वह विशेष मानी गई है अपरा एकादशी सनातन धर्म में इसका बहुत महत्व है कहा जाता है कि अचला या अपरा एकादशी व्रत का पूजन करने से अपार सुख की प्राप्ति होती है सनातन हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी का व्रत उपवास रखने से पादप या समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ज्ञानी सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति का भाग्य उदय होता है और उसके जीवन में से बहुत खुशियां प्राप्त होती हैं। मकर संक्रांति के समय गंगा स्नान सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र शिवरात्रि के समय काशी में स्नान करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है उससे भी कहीं अधिक पुण्य प्राप्ति अपरा एकादशी करने से होती है।

अपरा एकादशी पूजा व्रत विधि :-

एकादशी के उपवास में भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाएगी एकादशी के उपवास के लिए भक्तों को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन कर देना चाहिए।  दशमी तिथि के दिन रात्रि के समय सात्विक  अल्पाहार ग्रहण करना चाहिए।  ब्रह्मचर्य का पालन भी बहुत आवश्यक होता है इसके अलावा व्रत करने वाले जो भी स्त्री पुरुष है मन वचन और कर्म से शुद्ध आचरण रखें एकादशी के दिन प्रातः काल उठकर के नित्य क्रियाओं से निपट कर के स्नान आदि के पश्चात स्वच्छ होकर के संकल्प करना चाहिए मेरे भगवान श्री हरि विष्णु भगवान श्री विष्णु एवं बलराम की पूजा करनी चाहिए जहां तक हो सके इस एकादशी के दिन फलाहार ग्रहण करके इस व्रत को कर सकते हैं रात्रि के समय जागरण करना चाहिए तथा द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन दान या अन्य दान करके भी व्रत का पारणा करना चाहिए।

अपरा एकादशी का शुभ मुहूर्त और पारण का समय

 अपरा एकादशी 06.जून 2021

अपरा एकादशी तिथि प्रारंभ- 05 जून 2021 को 04 बजकर 07 मिनट से

अपरा एकादशी तिथि समाप्त- जून 06, 2021 को सुबह 06 बजकर 19 मिनट पर

अपरा एकादशी व्रत पारण मुहूर्त- 07 जून 2021 को सुबह 05 बजकर 12 से सुबह 07:59 तक

हमारे धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी व्रत करने वाले के समस्त पापों का नाश हो जाता है और प्रभु इस वर्ष से प्रसन्न होकर के साधक को अनंत पुण्य फल प्रदान करते हैं जेष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत रख कर के भगवान श्री विष्णु पूजा करने का विधान है इस एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है।  अपरा एकादशी का अर्थ यह है कि इस एकादशी का पुण्य अपार है इस एकादशी का व्रत करने से लोग सब पापों से मुक्त होकर के भवसागर से तर जाते हैं।

पुराणों में एकादशी व्रत के बारे में कहा गया है कि व्यक्ति को दशमी के दिन शाम में सूर्य अस्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए रात में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए और एकादशी के दिन सुबह जल्दी सूर्योदय के पहले उसके स्थान कर लेना चाहिए तथा वर्ड का संकल्प करके भगवान श्री विष्णु जी का संकल्प करना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए।  पूजा में तुलसी दल और चंदन गंगाजल आदि का उपयोग करना चाहिए भगवान श्री हरि विष्णु को तुलसी और गंगाजल सबसे अधिक प्रिय होता है और व्रत रखने वाले को पूरे दिन क्रम निंदा झूट , चल कपट से बचना चाहिए।

जो लोग किसी कारण वर्ष व्रत नहीं रख पाते हैं उन्हें भी एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए जो व्यक्ति एकादशी के दिन चावल खाता है। उसके सर पर या उसके ऊपर पाप बहुत अधिक बढ़ जाते हैं। जो व्यक्ति एकादशी के दिन सात्विक विचारों के साथ एकादशी कावर करता है उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं जो एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु के नामों का उच्चारण करता है या विष्णु जी के सहस्त्रनाम का पाठ करता है। उसके पर भगवान श्री नारायण की विशेष कृपा होती है।

   अपरा एकादशी का महत्व :- 

युधिष्ठिर कहने लगी कि है भगवान जेष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसका क्या महत्व है आप कृपया करके मुझे बताइए। भगवान श्री कृष्ण के आने लगे की है राजन इस एकादशी का नाम अपरा एकादशी है पुराणों के अनुसार जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम अपरा एकादशी है क्योंकि यह अपार सुख धन-धान्य अपार रूप से देने वाली है जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं वह संसार में अपार प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं इस दिन भगवान श्री विक्रम की पूजा करते हैं यानी श्री हरि नारायण की पूजा की जाती है अपरा एकादशी के प्रभाव से ब्रह्महत्या भूत योनि निंदा आदि के सारे दूर हो जाते हैं।  इस व्रत को करने से झूठ से किए गए सारे कार्य इस वर्क करने से नष्ट हो जाते हैं जो छतरी युद्ध भाग गए हैं वह गर्क गमी होते हैं।  एकादशी का व्रत करने से स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है जो विद्यार्थी या गुरु शिक्षा ग्रहण नहीं कहते हैं और गुरु की निंदा करते हैं वह भी अवश्य नरक में पढ़ते हैं मगर अपरा एकादशी का व्रत को करने से वह इस पाप से मुक्त हो जाते हैं जो फल तीनों पुष्कर में एकादशी पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तक मित्रों को विसर्जन करने से प्राप्त होता है वही फल अपरा एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है।  यह है वह तो पाप रूपी वृक्ष को काटने के लिए एक प्रकार से कुल्हाड़ी है।  पाप रूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान है मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान का पूजन करने से मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है और इस लोक में सभी प्रकार सुखों को प्राप्त करता है और उसकी निरंतर उन्नति होती है उसके घर में सुख शांति समृद्धि की प्राप्ति होती है और वह अंत समय में वैकुंठ लोक में विष्णु नारायण के लोग को प्राप्त कर जाता है।

 अपरा एकादशी की व्रत  कथा /कहानी 

प्राचीन समय की बात है।  किसी राज्य में महत्व नाम का एक  बहुत ही धर्मात्मा राजा था। राजा महत्व कितना हामान है उसका छोटा भाई वजरत भट्ट उतना ही पापी था।  वजरत भर्त महत्व से द्वेष करता था।  और उसको मारने के षड्यंत्र रचता रहता था एक बार वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जाता है और महत्व वक्त को मार कर के उसे जंगल में फिकवा देता है।  और कभी बात करने लगता है लेकिन सामाजिक मुद्दों के कारण महत्व को प्रेत का जीवन जीना पड़ता है वह पीपल के पेड़ पर रहने लगता है उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य में उसकी दुराचारी भाई से प्रजा दुखी थी ही साथ ही महत्व के प्रेत बनकर आने जाने दुख पहुंचाते हैं.

लेकिन उसके बाद पुण्य कर्मों का सौभाग्य कहिए कि उसको एक बार इसको वहां पर ऋषि गुजर रहे थे उन्हें आभास हुआ कोई प्रेत उन्हें तंग करने की का प्रयास कर रहा है।  अपने तपोबल से उन्होंने बुध को देख लिया और उसके भविष्य सुधारने का जतन करने लगे विचार करने लगे सर्वप्रथम उन्होंने पेज को पकड़ कर के उसे अच्छाई का पाठ पढ़ाया और उसकी मौत के लिए अपरा एकादशी का व्रत मैथ रखा और संकल्प करके वाइफ का पुण्य फाल प्रेत को दान कर दिया।  इस प्रकार से पेट जीवन से मुक्ति मिली और वह प्रेत वैकुंठ लोक को चला गया इस प्रकार अपरा एकादशी का जो कोई भी व्रत करता है अपने लिए करता है यह दूसरों के लिए करता है तो उसे अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार एक राजा ने अपने राज्य में बहुत ही मनमोहक उद्यान तैयार करवाया इस उद्यान में इतने मनोहर पुष्प लगते थे कि देवता भी आकर्षित हुए बिना।  नहीं रह सके और वह उद्यान से तुझको चुरा कर के ले जाते राजा चोरी से परेशान होते हुए उद्यान को बचाने के सारे प्रयास करता रहा लेकिन विफल नजर आ रहे थे अब चोर कोई इंसान करें तो पकड़ में आए मगर देखता दबे पांव आते अपना काम निकाल कर के किसी को कानों कान खबर नहीं होती और वहां से वह चले जाते। अभी राजपुरोहित ओ को याद किया गया सभी ने अंदाजा लगाया कि कोई देवी शक्ति का काम है किसी का इंसान की हिम्मत नहीं हो सकती और उन्होंने सुझाव दिया भगवान श्री हरि के चरणों में जो प्रश्न हम अर्पित करते हैं उन्हें उद्यान के चारों ओर डाल दिया जय। देखते ही बात बनती है या नहीं।  और कोई विकल्प हमें दिखाई नहीं दे रहा है। देवताओ  और अप्सराए नित्य की तरह आए।

लेकिन दुर्भाग्य से एक अप्सरा का पैर भगवान विष्णु को अर्पित किए हुए पुष्प ऊपर पड़ गया।  उस देवी के समस्त पुणे नष्ट हो गए और वह अन्य साथियों के साथ पुरान ना भर सकी यानी उड़ ना सकी उसके पुण्य नष्ट होने के कारण उसकी शक्ति छीन ली गई सुबह होते ही इस अद्वितीय युक्ति को देख कर के सब हैरान हो गए राजा को खबर गई।  राजा भी देखते ही सब भूलकर के मुक्त हो गए अप्सरा ने अपना अपराध कबूल करके सभी का वृतांत सुनाया और अपने किए पर पश्चाताप किया तब राजा ने कहा कि हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं

तब उसने कहा कि प्रजा में से कोई भी एक व्यक्ति भी ज्येष्ठ माह  के  शुक्ल पक्ष की एकादशी अपरा एकादशी का उपवास रख कर के उसका पुण्य मुझे दान कर देगा तो मैं अपने समझते पुण्य के साथ वापस लौट सकती हूं राजा ने प्रजा में घोषणा करवा दी। इनाम भी पैक कर दिया और रकम भी तय कर दी।  लेकिन कोई उत्साहजनक प्रक्रिया नहीं मिली राजा ने राशि बढ़ाते बढ़ाते आधा राज्य देने को तैयार हो गए लेकिन कोई भी सामने नहीं आया किसी ने एकादशी व्रत के बारे में तब तक सुना भी नहीं था ना राजा भी जानता था और पुरोहित को तो जाने का सवाल ही नहीं होता परेशान अप्सरा में चित्रगुप्त को याद किया तब अपने बहीखाता देश करके जानकारी दी इस नगर में एक सेठानी से अनजाने में एकादशी का व्रत हुआ है यदि वह संकल्प लेकर के उसका पुण्य प्रदान कर दे तो बात बन सकती है उसने राजा को यह बात बताई वह जाने से सम्मान सेठानी को राज महल में बुलाया।

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संकल्प करवाकर के सेठानी मैं अपने वर्थ का पुण्य उसे दान में दे दिया।  प्रजा का धन्यवाद करके स्वर्ग लोग को प्रभाव है अक्षरा लौट गई वही अपने वादे के मुताबिक सेठ सेठानी को राजा ने अपनी आधा राज्य दान क्र दिया।  राजा अब तो तू एकादशी के महत्व को समझ रखा था।  उसने आज से लेकर के 80 साल तक राज परिवार सहित राज्य के सभी स्त्री पुरुषों के लिए वर्ष की प्रति एक एकादशी का उपवास करवाना अनिवार्य करवा दिया इस प्रकार एकादशी के पुण्य के प्रभाव से दूसरे लोग भी प्रभावित हुए।

यदि आप अपने लिए एकादशी का व्रत करेंगे तो निश्चय ही आप पुण्य फाल की प्राप्ति होगी इस प्रकार एकादशी का व्रत विधि विधान से आपको बता दिया।

Nirjala Ekadashi 21 June 2021 भूलकर भी ना  करें, ये