Devshayani  Ekadshi 2020 : 1 जुलाई से ”पाताल लोक” में  -सोने जा रहे है। देव ,अब 4 महीने तक नहीं होंगे ,मांगलिक कार्य।

 

Devshayani  Ekadshi 2020 : 1 जुलाई से ”पाताल लोक” में 

-सोने जा रहे है। देव ,अब 4 महीने तक नहीं होंगे ,मांगलिक

कार्य।

 

देवशयनी एकादशी का महत्व :- सनातन धर्म में एकादशी का व्रत का बहुत महत्व होता है। हर एक साल में 24 एकादशी आती है। लेकिन जब अधिक मास या मलमास आता है। तब उनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है।  आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते है।  क्योकि सूर्य के मिथुन राशी में आने पर ये एकादशी आती है। और इस दिन से ही चतुर्थमास की शुरुआत मानी जाती है। ऐसी मान्यता है

की इसी दिन से भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में शयन करते है। और फिर चार माह बाद तुला राशि में सूर्य  के जाने पर भगवान को उठाया जाता। है। इस बीच के समय को ही चतुर्मास कहाँ जाता है।

 

1 जुलाई को देवशयनी एकादशी :- आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहते है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह एकादशी हर साल जुलाई महीने में ही आती है। इस साल देवशयनी एकादशी 1 जुलाई 2020 यानि की बुधवार को देवशयनी एकादशी है। एकादशी तिथि 30 जून को शाम को 7 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी।

पुराणों में वर्णित देवशयनी एकादशी :-भगवान विष्णु इस दिन से चार महीने (चातुर्मास ) के लिये पाताल में राजा बलि के द्वार  निवास करके कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को लौटकर है। इस समय से विवाह ,संस्कार ,दीक्षा ग्रहण ,यज्ञ ,गृहप्रवेश ,गऊ दान ,प्रतिष्ठा एवं जितने भी मांगलिक कार्य है। वे सभी त्याज्य होते है। यानि जब तक भगवान विष्णु निद्रा से नहीं जागते है ,तब तक  कोई भी शुभ कार्य करना। अच्छा नहीं  माना जाता है। इन चार महीनो में शादी ,विवाह ,मुंडन संस्कार ,ग्रहप्रवेश और नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी ,औरनामकरण संस्कार जैसे कार्य करना वंचित माना जाता है।

 

1 जुलाई से 24 नवम्बर तक चतुर्मास रहेगा।

शास्त्रों के अनुसार हरी शब्द सूर्य ,चन्द्रमा ,वायु ,विष्णु चन्द्र्मा के तेज ,आदि अनेक अर्थो में प्रयुक्त है। हरी शयन का मतलब इन चार महीनो में बादल और वर्षा के कारण सूर्य -चन्द्रमा के तेज क्षीण हो जाने से है। पीत स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीर की शक्ति सो जाती है। क्योकि व्यक्ति किसी भी कार्य को करने में समक्ष नहीं हो पाता है। इसीलिये इन चार महीनो में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। वर्षा ऋतु के कारण कई प्रकार के कीटाणु अर्थात

सूक्ष्म रोग और जंतु उत्पन हो जाते है। और जल की बहुलता और सूर्य का प्रकाश भी भूमि पर काफी कम मिलता है

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