Ganesh Katha : यह चमत्कारी कथा सुनने से सभी मनोकामन पूरी होती है!

Ganesh Katha : यह चमत्कारी कथा सुनने से सभी मनोकामन पूरी होती है!

सबसे पहले हम आपको यह बताते हैं कि गणेश जी का जन्म कैसे हुआ।

जब 1 दिन माता गौरी स्नान करने गई थी तब माता गौरी जी ने नंदी जी से कहा था कि आप द्वार का ध्यान रखना की महलों के अंदर कोई भी ना आने पाए। जब तक मैं स्नान करके वापस ना आ जाओ। जैसे ही माता गौरी ने यह वचन नंदी जी से कहा तो नानी जी ने भी हाथ जोड़कर उनके वचनों का मान रखते हुए कहा जैसे आपकी इच्छा माते। लेकिन कुछ समय बाद भोलेनाथ जी प्रवेश करने के लिए आए थे। नंदी जी ने कहा कि माता का आदेश है किसी को भी भीतर ना जाना पाए। मगर भगवान भोलेनाथ को अंदर जाने से रोक ना पाए।

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फिर गौरी जी ने कहा कि नंदी तुमने मेरी बात नहीं मानी। फिर नंदी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जब भोलेनाथ थे तो मैं कैसे रोक पाता भोलेनाथ जी को। तब माता गौरी के मन में एक विचार आया तब उन्होंने अपने उबटन से ही एक पुतला बनाया और मंत्रों का जाप करके उस पुतले में प्राण भर दिए थे। फिर शुभ मुहूर्त में गौरव जी ने उस पुतले का नाम गणेश रख दिया। फिर गणेश जी को कहा कि तुम हमेशा माता का ही आज्ञाकारी बनकर रहना। मुझे यह विश्वास है कि तुम मेरी यह बात जरूर मानोगे। फिर गणेश जी हाथ जोड़कर माता गौरी के शीश झुकाते हैं।

फिर से 1 दिन माता गौरी स्नान करने गई। तो उन्होंने गणेश जी को पहरेदार बनाकर कर खड़ा कर दिया था और बोला किसी को भी अंदर मत आने देना जब तक मेरा स्नान पूरा ना हो जाए। फिर तभी भगवान भोलेनाथ अंदर जाने को आते हैं। उन्होंने गणेश जी को देखा और सोचने लगे कि यह बालक कौन हैं , जो द्वार पर खड़ा है और मुझे अंदर जाने से रोक रहा है। तब भगवान भोलेनाथ जी ने गणेश जी से पूछा कि तुम कौन हो और कहां से आए हो। फिर गणेश जी ने अपना परिचय भोलेनाथ जी को बता दिया। फिर भोलेनाथ जी अंदर जाने लगे तो गणेश जी ने रोका। भोलेनाथ जी कहने लगे कि तुम मुझ रोक रहे हो तुम जानते हो मैं कौन हूं।

तब गणेश जी ने कहा आप जो भी है मेरी मां का आदेश है कि जब तक वह ना कहे तब तक किसी को भीतर आने ना दें। आप यहां से कृपया चले जाए। तब भगवान भोलेनाथ जी ने नंदी से कहा कि जरा इसको समझाओ और इसको यह से हटाओ। फिर नंदी जी ने भी गणेश जी को बार-बार समझाया कि यहां से हट जाओ , यह भगवान भोलेनाथ है यह किसी की नहीं सुनते, फिर भी गणेश जी नहीं माने। तो नानी जी ने बल प्रयोग किया फिर भी गणेश जी जीत गए और वहां से नहीं हिले। फिर सभी वहां आ गए गणेश जी को हटाने। किसी से भी गणेश जी नहीं हार पाए। सब हार गए मगर गणेश जी वही खड़े रहे और बोलने लगे सब यहां से चले जाओ। जब तक मैं की अनुमति नहीं दे देती तब तक मैं किसी को भी अंदर जाने नहीं दूंगा।

फिर भोलेनाथ जी ने सभी देवों को वहां बुलायागणेश जी को समझाने। सभी देवों के समझाने पर भी गणेश जी नहीं समझे और वह द्वार से बिल्कुल नहीं हटे। फिर इंद्रदेव ने पांच शक्तियों का एक बाण गणेश जी पर छोड़ दिया। तब भी वह बाण किसी भी कार्य ना आ पाए। यह सब देख कर भगवान भोलेनाथ को बहुत क्रोध आ गया और वह त्रिशूल लेकर गणेश जी के निकट चले गए। फिर भोलेनाथ जी ने अपना त्रिशूल चला दिया। त्रिशूल चलाने से गणेश जी की गर्दन अलग हो गई थी। जब श्री गौरव जी ने यह सब देखा और सुना तो वह बहुत रोने लग गई। फिर भोलेनाथ को दोष देने लग गई कि आपने यह क्या कर दिया। मैंने ही इस को आदेश दिया था कि किसी को भी भीतर ना आने देना। जब तक मैं आदेश ना दूं।

फिर बोली कि आप ही को इसी के प्राण वापस लाने पड़ेंगे। रो-रोकर गौरव जी बीमार पड़ गई. फिर भोलेनाथ जी ने कहा कि गणेश का सिर खंडित हुआ है। जो भी मां अपने बच्चे से मुंह फेर कर सोई हो उस बच्चे का सिर इसे लगाएंगे। फर सभी देवता ऐसे शीश को ढूढ़ने चले गए जो माँ अपने बालक से पिट घुमाकर सोइ हो। मगर ऐसा कोई भी ना मिला। सभी दिशाओ में ढूढने के बाद भी ऐसा कोई सर न मिल पाया। फर अंत में एक हातनि नजर में आई थी। उसी का सिर वो तो ले आए और भगवन भोलेनाथ ने उसी का सिर गणेश जी को लगा दिया। गर्दन लगते ही गणेश जी के प्राण वापिस आ जाते है। प्राण वापिस आते ही सबसे पहले गणेश जी ने अपने माता पिता के शीश झुकाया। इसलिए गजन्द भी ये खेहलाते है।

एक दिन गणेश जी और कार्तिक में बात छीर गई की हमारे माता पिता गोरा और भोलेनाथ है। कार्तिक जी बोले की मैं हु बड़ा तुम से और तुम मुझसे छोटे हो। तब भी माँ ने तुम ही को बोला सबसे उत्तम और श्रेष्ट। इस बात को पूछने दोनों भ्रम जी के पास गए। मगर इस का उत्तर भ्रम जी नहीं दे पाए। उन्होंने कहा की आप दोनों विष्णु जी के पास जाओ शायद आप को उतर मिल जाए। क्युकी विष्णु जी को मुझसे ज्यादा ज्ञान है। फर वो दोनों विष्णु जी के पास जाते है। विष्णु जी ने तो दोनों को ही सबसे ज्यादा शेष्ट बताया। मगर उनके उत्तर से दोनों सहमत नहीं हुए। फर विष्णु जी ने कहा की इसका सही उत्तर तूमे भोलेनाथ जी ही देंगे। तुम दोनों उन्ही के पास जा कर पूछो। दोनों यह ही प्रश्न लेकर भगवन भोलेनाथ जी के पास गए। यह प्रश्न पूछने के बाद भगवन भोलेनाथ जी मुस्काये। उन्होंने कहा अपने आपको उत्तम साबित करने के लिए तुम दोनों को पूरी दुनिया की प्रकिमा करनी होगी। जो सबसे पहले आएगी वो ही सर्वश्रेष्ट होगा।

यह सुन कर कार्तिक जी अपने मयूर को ले कर उर जाते है। कार्तिक जी के उर जाने से भगवान गणेश जी मन ही मन मुस्काये। मूषक जी से तो मोर को पीछा तो नहीं होगा। फर उन्होंने अपने बल का नहीं भुधि का प्रयोग किया। फर गणेश जी अपने मूषक के साथ ही माता पिता के के पास गया और उनकी प्राकृणमा करने लगा और बोले आप ही हो मेरा पूरा संसार। यह सुन कर भगवान भोलेनाथ जी बोले तुम्हारी दूर की दृष्टि है। जब कार्तिक जी लोट कर आए तो यह सब देखकर चक्राये। कैसे मुझसे पहले यह भ्रमांड घूम आए। फर भगवान भोलेनाथ जी से कार्तिक को सारी बात बताई।

जब गणेश जी ने कहा की पता पिता के चरणों में ही है पूरा संसार तो यह बात कार्तिक को भी साथी लगी। भगवान गणेश जी को ही भोलेनाथ जी ने उत्तम बताया। और कहा की तुम सभी देवता के पहले

पूजे जाओगे। ऐसे लिए सभी देवो से पहले भगवान गणेश जी की पूजा होती है।

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