सकत चौथ व्रत कथा

सकत चौथ व्रत कथा

 

1.सकत चौथ व्रत कथा

बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक साहूकार और साहूकारनी रहते थे और वह दोनों ही धर्म पुण्य को बिलकुल भी नहीं मानते है। धर्म पुण्य को बिल्कुल न मानने की वजह से उनकी कोई संतान नहीं थी। एक बार सकत चौथ वाली दिन, साहूकार दंपत्ति की पड़ोसन सकत चौथ की पूजा करने के बाद व्रत कथा सुना रही थी। तभी साहूकारनी ने पड़ोसन से पूछा की, यह तुम क्या कर रही हो? तो पड़ोसन ने जवाब दिया की आज सकत चौथ का व्रत है, इसलिए सकत चौथ की कथा सुना

रही हूँ। फिर साहूकारनी ने पूछा की व्रत रखने से क्या होता है? पड़ोसन बोली की, व्रत रखने से सब कुछ मिलता है और पुत्र भी। तो साहूकारनी ने कहा यदि मेरा गर्भ हो जाए तो में सकत चौथ का व्रत करुँगी और सवा सेर तिलकुट करुँगी। इसका कुछ समय बाद साहूकारनी का गर्भ हो गया, तो वह बोली मेरा पुत्र हो तो में ढाई सेर तिलकुट करुँगी। फिर उसका पुत्र पैदा हुआ। जिसके बाद साहूकारनी बोली हे चौथ भगवान! मेरे पुत्र का विवाह हो जाए, तो में सवा पांच सेर तिलकुट करुँगी। जब साहूकार का पुत्र विवाह लायक हुआ तो उसका विवाह तय हुआ और वह विवाह करने के लिए चला गया। परन्तु साहूकारनी ने अब तक तिलकुट नहीं किया था और जिस वजह से चौथ देवता क्रोधित हो उठे। क्रोध में आने के बाद चौथ देता ने साहूकारनी के पुत्र को मंडप से उठा कर पीपल के पेड़ पर बैठा दिया। अब सभी लोग साहूकार के पुत्र की तलाश में लग गए पर वह नहीं मिला, जिसके बाद सब लौट आए। इसके बाद साहूकारनी की होने वाली बहु अपनी सहेलियों के साथ जंगल में गणगौर पूजन के लिए चली गई। तभी मार्ग में उन्हें एक आवाज सुनाई दी, ओ मेरी अर्धब्याहि। यह सुन लड़ी अपने घर आ गई और वह सूखने लगी और बहुत पतली हो गई। कुछ दिनों बाद लड़की की माता ने कहा की मैं तुम्हे इतना अच्छा खिलाती हूँ अच्छा सामान देती हूँ, फिर भी तुम दुबली होती जा रही हो। क्यों? तो उस लड़की ने बोलै की मैं जब भी जंगल में दुब लेने जाती हूँ तो पीपल के पेड़ से आवाज़ आती है, ओ मेरी अर्धब्याहि, उस आदमी ने मेहँदी लगा राखी है और सिर पर सेहरा भी बांध रक्खा है। तब उसकी माँ भी वहाँ देखने गई तो यह पता चला की वह आदमी तो उसका दामाद है। फिर उसकी माँ ने पूछा, की आप यहाँ क्या कर रहे है? मेरी बेटी तो अर्धब्याहि कर दी अब क्या? तो फिर साहूकार का पुत्र बोला, की मेरी माता ने तिलकुट बोला था, लेकिन कुछ नहीं किया और जिस वजह से चौथ माता क्रोधित हो गई और मुझे यहाँ बैठा दिया। तो यह सब सुनकर लड़की की माँ साहूकार के घर गई और साहूकारनी से बोला की आपने सकत चौथ का कुछ बोला था? तब साहूकारनी बोली की तिलकुट का बोलै था। फिर साहूकारनी बोली की मेरा पुत्र जब घर आ मैं ढाई मन तिलकुट करुँगी। जिसके बाद भगवान गणेश प्रसन हो गए और फिर साहूकारनी के पुत्र को फेरों पर बैठा दिया। अब उसके पुत्र का विवाह सही से हो गया। इसके बाद साहूकारनी का पुत्र और बहु दोनों घर आए जिसके बाद साहूकारनी ने ढाई मन तिलकुट किया और चौथ देव से बोला, हे चौथ देव! आपके आशीर्वाद से मेरे दोनों पुत्र और वधु घर आए, जिसकी वजह से में हमेशा तिलकुट करके व्रत रखूंगी। इसके बाद से सारे नगर वालों ने तिलकुट के साथ सकत चौथ का व्रत रखना शुरू कर दिया।

 

2.सकत चौथ व्रत कथा

धार्मिक मान्यतानुसार एक राज्य का राजा महाराजा हरिश्चंद था। महाराजा के राज्य में एक कुम्हार रहा करता था। एक बार उस कुम्हार ने बर्तन बनाने के लिए आवा लगाया, पर आवा पका ही नहीं। बार – बार, कई बार ऐसा ही हुआ। अब बर्तन वाले का बहुत नुकसान हो गया। संकष्टी चतुर्थी के दिन कुम्हार एक तांत्रिक के पास मदद मांगने के लिए गया। तांत्रिक ने कुम्हार को एक भयानक उपाय बताया, तांत्रिक ने कुम्हार को एक बच्चे की बलि देने को बोला। उस दिन एक बालक की मां ने अपनी संतान की सुख शांति, समृद्धि और लंबी आयु के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा हुआ था। कुम्हार ने उस महिला के बालक को आवा में डाल दिया। यह देख बालक की माता ने अपने बच्चे की सलामती के लिए भगवान गणेश से प्राथना की। अब जब कुम्हार बर्तन को देखने गया तो सभी बर्तन पके हुए थे और बालक भी सही – सलामत वही पर बैठा था। यह सब देख कुम्हार भयभीत हो गया और राजा हरिश्चंद को पूरी बात सुनाई। यह सब सुन कर रा ने तुरंत उस बालक और उसकी माता को बुलाया। मां आते ही संकट चौथ की महिमा का गुणगान करने लगी। इसके बाद से हर महिला अपनी संतान के लिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने लगी।

 

 

3.सकत चौथ व्रत कथा

एक बार की बात है, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह की तैयारी चली रही थी। विवाह में सभी देवताओं को आमंत्रित दिया गया था परन्तु भगवान गणेश को विवाह के आमंत्रण नहीं भेजा गया था। सभी देवता अपनी पत्नी के साथ विवाह में शामिल हुएं। सभी ने जब भगवान गणेश को वहां न पाया तो उन्होंने भगवान विष्णु से इसका कारण पुछा। भगवान विष्णु ने इसका जवाब दिया की मैंने भगवान शिव और माता पारवती को आमंत्रित और गणेश अपने माता – पिता के साथ भी आ सकते थे। और यह भी कहा की भगवान गणेश को सवा मन चावल, घी, लड्डू और मूंग का भोजन लगता है। भला कोई किसी और के घर जाकर इतना खाता है। अच्छा हुआ वो नहीं आएं। तभी एक देवता ने कहा, की गणेश जी अगर आएं तो उनको घर के देख भाल की जिम्मेदारी के लिए रखा जा सकता है। गणेश जी से कहा जा सकता है की आप मूषक पर बैठ कर धीरे – धीरे आएंगे तो बारात आगे चली जाएगी और वो पीछे ही रह जाएंगे, ऐसे होने पर अब आप घर की देख – रेख कर कर लें। अब विष्णु जी ने गणेश जी को आमंत्रण किया और आमंत्रण पर गणश जी वहां आए। गणेश जी को विष्णु जी के घर के देख – रेख की जिम्मेदारी दे दी गई। अब गणेश जी घर पर अकेले थे और तभी नारद जी वहां पर आए और इसका कारण पूछा। गणेश जी ने नारद को कहा की भगवान विष्णु ने उन अपमान किया है। यह सब सुन गणेश जी को नारद जी ने एक हल बताया। गणेश जी ने हल के तहत अपने मूषक के दल को बारात के आगे भेज दिया और रास्ता खुदवा दिया। रास्ता खुदा होने की वजह से सभी रथ रस्ते में धंस गए और वो सब बीच रस्ते में रुक गए। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, फिर नारद जी ने विघ्नहर्ता गणेश जी को बुलाने की बात रखी। भगवान शिव के आदेश गणेश जी को बुलाया गया। अब देवताओं ने गणेश जी की पूजा की। फिर सभी पहिये गड्ढे से निकल गए परंतु कई पहिये टूट गए थे। तभी वही पास में एक लोहार काम कर रहा था, उसे वह पर बुलाया गया। लोहार ने अपना कार्य शुरू कर दिया और काम शुरू करने से पहले अपने मन में गणेश जी का संस्मरण किया और बहुत जल्दी सारे पहिये ठीक कर दिए। लुहार ने कहा की आपने शुभ कार्य करने से पहले पहले गणेश जी की पूजा नहीं की थी। आप सब को गणेश जी का स्मरण काम शुरू करना चाहिए। कार्य हमेशा सफल होगा। सभी बाराती अब अपने स्थान पर सुरक्षित पहुँच गएं और भगवान िष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह संपन्न हो गया।

 

4.सकत चौथ व्रत कथा

एक बार की बात है। एक दिन माता पार्वती नदी के किनारे बैठी हुई थी और उनके साथ भगवान शिव थे। माता पार्वती को चोपड़ खेलने की इच्छा हुई। पर वह केवल दो ही लोग थे और कोई तीसरा नहीं था, जो खेलमें हर जीत का फैसला करे। ऐसे देख शिव जी ने एक मिटटी के पुतले में जान फूंक दी। अब वह तीन लोग हो गए। चोपड़ के खेल में माता पर्वती 4 बार जीत गई। परन्तु एक बार निर्णायक ने माता पारवती हो हरा हुआ और शिव जी को जीता हुआ घोषित कर दिया। यह देख माता पार्वती क्रोधित हो उठी। क्रोधित माता पार्वती ने उस निर्णायक को श्राप दे कर लंगड़ा बना दिया। उस निर्णायक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी पर माता पारवती ने कहा के ये श्राप अब वापस नहीं होगा। परन्तु एक उपाय दिया। माता पार्वती ने कहा, संकष्टी चतुर्थी के दिन कुछ माताएं और कन्याएं यहाँ पूजा हेतु आती है। तुम उनसे व्रत और पूजा की विधि पूछ कर व्रत रखों। उसने ठीक वैसा ही किया और संकष्टी पूजा का व्रत संपन्न किया। उसकी व्रत और पूजा का परिणाम गणेश जी ने उसका पैर ठीक कर दिया।

 

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