संज्ञा के विकारक तत्त्व :लिंग, वचन और कारक

 

संज्ञा के विकारक तत्त्व :लिंग, वचन और कारक

शब्द के जिस रूप से यह पता चले की वह पुरुष जाति का है अथवा स्त्री जाती का, उसे लिंग कहते हैं।

 

व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर शब्द दो प्रकार के होते हैं – विकारी तथा अविकारी। संज्ञा विकारी शब्द है अर्थात इनके रूप में परिवर्तन हो जाता है। परिवर्तन के तीन आधार हैं – लिंग, वचन और कारक।

उदाहराणर्थ:  लड़का पुस्तक पड़ता है,  लड़की पुस्तक पड़ती है

क. राजा दरबार में बैठा है।

लड़का खेल रहा है।

ख. रानी अपनी सखियों के साथ टहल रही है।

लड़की नाच रही है।

‘क’ वर्ग के वाक्यों में ‘राजा’, ‘लड़का’ शब्द पुरुष वर्ग के हैं और ‘ख’ वर्ग में ‘रानी’, ‘लड़की’ शब्द स्त्री वर्ग के है।

हिंदी में लिंग दो प्रकार के है :

  1. पुल्लिंग
  2. स्त्रीलिंग

पुल्लिंग : पुरुष या नर जाती का बोध कराने वाले शब्द पुल्लिंग कहलाते हैं; जैसे – बैल, नर, बालक, शेर, फल, भवन, मनुष्य, बन्दर, देवर, दास आदि।

स्त्रीलिंग : स्त्री या नारी जाती का बोध कराने वाले शब्द स्त्रीलिंग कहलाते है; जैसे – गाय, नारी, बालिका, शेरनी, बँदरिया, देवरानी, दासी आदि।

 

हिंदी में पुल्लिंग शब्दों में ‘ई’ आदि जोड़कर स्त्रीलिंग शब्दों का निर्माण किया जाता है; जैसे – लड़का-लड़की, बच्चा-बच्ची आदि।  कुछ शब्दों के आरंभ में नर या मादा लगाकर भी लिंग परिवर्तन किया जाता है; जैसे – नर कौवा,मादा कौवा। अधिकांश प्राणियों के लिंग निश्चित होते हैं।  किन्तु निर्जीव वस्तुओं के लिंग निर्धारण में असुविधा होती है। वाक्य में प्रयोग करके ही उनका लिंग ज्ञान होता है; जैसे –

कमरा बहुत बड़ा है।      (पुल्लिंग)

कक्षा छोटी है।          (स्त्रीलिंग)

उभयलिंग शब्द : कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनका प्रयोग दोनों लिंगों में हो सकता है; जैसे – प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल, राजदूत, मैनेजर, इंजिनियर आदि।

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